यूं होता तो क्या होता…

न था कुछ ..तो खुदा था … कुछ न होता तो खुदा होता
डुबोया मुझ को होने ने… न होता मै तो क्या होता..

हुआ जब गम से यूं बेहिस … तो गम क्या सर के कटाने का
न होता गर जुदा तन से… तो जान्नों पर धरा होता..

हुई मुद्दत.. के ‘ग़ालिब‘ मर गया  पर याद आता है
वो हर एक बात पे कहना… के यूं होता तो क्या होता..

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